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आज के दिन शिक्षकों के प्रति सम्मान की परंपरा है....उनके बारे में अच्छी-अच्छी बातें करना ही शिष्टता है....किंतु न चाहते ही भी इसी दिन ऐसे शिक्षकों की याद भी बरबस ही मानस पटल पर तैर ही जाती है... जिन्होंने हमें अपनी खीज, निराशा याकंुठा का शिकार कभी-न-कभी बनाया ही होगा। आज शहरों में तो स्कूलों का पूरा ही परिदृश्य ही बदल चुका है लेकिन गाॅंव-कस्बों के स्कूलों में तो अधिकतर शिक्षकों का अधिनायकवाद ही चलता है।
पढाई में बहुत बुरा नहीं था...और अनुशासन में रहने में भी कभी कोई समस्या नहीं थी..फिर भी दो-तीन बार के थप्पड.-चांटे और बेंत की पिटाई बिना वजह मात्र शिक्षकों की गलतफहमियों के कारण झेलनी पड.ी। एक शिक्षक थे, लंबे-तगडे मोटी तलवारी मूंछे...हाथ में तीन फीट लंबी छडी.....अनुशासन अध्यापक कहलाते थे...मा,,,,चो...उनकी फेवरेट गाली थी जो कब किसे शिष्य को दे दी जाए....कुछ पता नहीं था। एक ओर थे जो अंग्रेजी पढाते थे....और बात-बात में शिष्य की माॅं-बहन के साथ यौनिक संबध स्थापित करने वाली गालियाॅं सुनाया करते थे...इतिहास पढाने वाले एक शिक्षक थे जो रात भर अपने गुड के कोल्हू की देखभाल करते थे और दिन में कक्षा में आकर सो जाया करते थे.....बच्चों को पहले ही बता दिया करते थे कि जब एक पैराग्राफ समाप्त हो जाए तो दूसरा बच्चा स्वयं दूसरा पैरा पढ ले...मेरी नींद डिस्टर्ब ना करे कोई... प्राइमरी स्कूल में एक दिन कक्षा में लगा छुटिटयों का चार्ट पढकर खुश हो रहा था...तभी झन्नाटेदार थप्पड जो हैड मास्साब ने रसीद किया था...उसकी गूंज आज तक कडवी यादों से मुक्ति नहीं दिला पाई है.... लेकिन शिक्षक तो महान होता है....अंतर हाथ सहार दे....बाहर बाहे चोट.....और चाहे वह चोट मासूम मन पर ही क्यों न जा लगे....

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