Skip to main content

Posts

ये जीत आम आदमी की...
राजनीति में आम आदमी का अस्तित्व और भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए यह जीत बहुत थी। भाजपा केवल और केवल जीतने के लिए चुनाव लड़ रही थी लेकिन आप पार्टी के लिए यह जिंदा रहने का संघर्ष था। भाजपा ने  इस चुनाव को अपनी नाक का प्रश्न बना लिया था लेकिन आप पार्टी की ध्यान केवल अपने लक्ष्य की ओर लगा था। यदि इस चुनाव में वह हार जाती तो शायद पूरी तरह बिखर जाती। बचती भी तो उसे फिर से खडा करने में कितना समय लगता, बता पाना मुश्किल है।
बिना किसी कोलाहल और शोर-शराबे के आप के वालंटियर अपना काम कर रहे थे। ये वालंटियर ही किसी पार्टी की रीढ़ की हड्डी होते हैं। कांग्रेस का सेवादल कभी ऐसे ही काम करता था, भाजपा के लिए संघ के स्वयंसेवक भी यही काम करते थे। सालों से पार्टी के लिए काम कर रहे भाजपा के कार्यकर्ताओं की घोर अनदेखी हुई और रातों-रात दूसरी पार्टियों के बगावती लोगों को शीर्ष पर बैठाने और टिकट बाॅंटने से भाजपा के कार्यकर्ता मायूसी और हताशा घिर गए और उन्होंने काम करने से पल्ला झाड़ लिया। नतीजतन भाजपा के नीचे से जमीन कब खिसक गई, उसे पता ही नहीं चला। इस चुनाव में भाजपा के प्रचार का स्तर अत्यंत …
Recent posts
आज के दिन शिक्षकों के प्रति सम्मान की परंपरा है....उनके बारे में अच्छी-अच्छी बातें करना ही शिष्टता है....किंतु न चाहते ही भी इसी दिन ऐसे शिक्षकों की याद भी बरबस ही मानस पटल पर तैर ही जाती है... जिन्होंने हमें अपनी खीज, निराशा याकंुठा का शिकार कभी-न-कभी बनाया ही होगा। आज शहरों में तो स्कूलों का पूरा ही परिदृश्य ही बदल चुका है लेकिन गाॅंव-कस्बों के स्कूलों में तो अधिकतर शिक्षकों का अधिनायकवाद ही चलता है।
पढाई में बहुत बुरा नहीं था...और अनुशासन में रहने में भी कभी कोई समस्या नहीं थी..फिर भी दो-तीन बार के थप्पड.-चांटे और बेंत की पिटाई बिना वजह मात्र शिक्षकों की गलतफहमियों के कारण झेलनी पड.ी। एक शिक्षक थे, लंबे-तगडे मोटी तलवारी मूंछे...हाथ में तीन फीट लंबी छडी.....अनुशासन अध्यापक कहलाते थे...मा,,,,चो...उनकी फेवरेट गाली थी जो कब किसे शिष्य को दे दी जाए....कुछ पता नहीं था। एक ओर थे जो अंग्रेजी पढाते थे....और बात-बात में शिष्य की माॅं-बहन के साथ यौनिक संबध स्थापित करने वाली गालियाॅं सुनाया करते थे...इतिहास पढाने वाले एक शिक्षक थे जो रात भर अपने गुड के कोल्हू की देखभाल करते थे और दिन में कक्ष…

हमारा वाल्ट डिजनी

पाठ्यपुस्तकों से बाहर भी किताबों की एक दुनिया होती है, 8-9 वर्ष की आयु में जब यह पता लगा तो पहला परिचय हुआ उस समय की हास्य पत्रिका ‘लोटपोट’ से....और उसमें भी सबसे मजेदार चरित्र चाचा चैाधरी और पिंकी से। प्राण कुमार शर्मा, जिन्हें हम प्राण के नाम से जानते थे, वास्तव भारत के वाल्ट डिजनी थे। जहाॅं पश्चिम के कार्टून चरित्र आकर्षक, बलिष्ठ और हथियारों से लैस होते थे वहीं सरलता से गुदगुदाने वाले वाले उनके साधारण कैरेक्टर सीधे-सादे और पास-पड़ोस से उठाए गए थे जो सहज हास्य उत्पन्न करते थे।


‘सरिता’ में आने वाला उनका एक और चरित्र था-श्रीमती जी, जिसमें शहरी पति-पत्नी के बीच की नोकझोंक और हास्य उत्पन्न करने वाली परिस्थितयां इतनी सहज होती थी, जैसी साधारणतः रोजमर्रा की जिंदगी में घटती रहती हैं।

किताब इतिहास की बड़ी बेवफा...रात भर रटी सवेरे सफा।.....शरारती किशोर बिल्लू जो ‘पराग’ में आता था मानों हम किशोरों के मन की उलझन ही बयान कर देता था। वाकई प्राण साहब बेजोड़ थे। आज यदि धड़ल्ले से उनके आर्टवर्क, कथ्य शिल्प और चरित्रों की नकल बाजार में हो रही है, ये भी उनकी सफलता का ही प्रमाण है।

अभिव्यक्ति की आजादी का …

ये जीवन है

आज आफिस पहुँचा तो बालकोनी में जाकर बाहर का नजारा देखने का मन हुआ। आॅफिस के ठीक सामने स्थित स्कूल की नवनिर्मित इमारत के सामने एक रिक्शा आकर रूका। उसमें एक बीस-बाईस वर्ष की नवयुवती बैठी थी। दिखने में आकर्षक थी। स्वाभाविक कौतूहल के चलते मैं देखता रहा। युवती रिक्शा में बैठी-बैठी ही स्कूल के वॉचमैन से कुछ पूछ रही थी। मैं सोचने लगा-कोई महारानी है क्या? जब स्कूल आई ही है तो क्यों नहीं नीचे उतरकर वॉचमैन के पास जाकर बात करती ...इतनी दूर से रिक्शा में ही बैठी सब कुछ जानना चाहती है।
वॉचमैन से बात कर रिक्शा से उतरने के लिए उसने एक पैर आगे बढ़ाया। चुस्त लेग-इन। ईमानदारी से कहूँ तो दूसरा पैर आगे आकर शायद चलने का अंदाज देखने की प्रतीक्षा..... अचानक मैं भौचक्का रह गया....लगा जैसे किसी पहाड़ से नीचे जा गिरा हूँ। दूसरा पैर आगे आया ही नहीं। फुर्ती से उठी बैसाखी ने उसके दूसरे पैर की जगह संभाल ली। चांद पर ग्रहण ......क्यूँ हुआ? कैसे हुआ, जो यह विकलांग है?
वॉचमैन ने दरवाजा नहीं खोला और उसे गेट-पास भरने को दिया। किसी तरह उसने खड़े-खड़े ही फार्म भरा, तब कही जाकर गेट खुला और वह स्कूल में दाखिल हुई।
श्रद्धा, भक्ति, और पिकनिक, मस्ती का मिश्रण- कांवड़ लाकर जलाभिषेक करने का उत्सव एक बार फिर शुरू हो चुका है। हरिद्वार जाने वाले सारी सड़के भगवा रंग में रंग चुकी हैं। इन्हीं दिनों अराजकता और हुड़दंग के कारण कभी-कभी ये सड़के खूनी लाल भी हो जाती है। रेलगाड़ी की छतों पर बैठकर हरिद्वार जाने का थ्रिल रूड़की में कल एक की जान ले चुका है। तेज गति से बसों और मोटरसाइकिलों पर चलते ये शिवभक्त कई बार दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते हैं तो कभी जनसामान्य से इनका जरा सी बात पर बवाल हो जाता है और ये शिव का तांडव नृत्य दिखा देते हैं। रास्ते भर सुस्वादु भोजन मुफ्त में उपलब्ध! मालिश और दवाइयों का इंतजाम .... शिवमय है सारा उत्तर भारत! पुलिस की जान शामत में ... रोके से ना रूकते ये छोरे ... खाकी वर्दी भगवा वर्दी से खौफजदा.. किसी तरह इस सुनामी के शांति से गुजर जाने का इंतजार करती रहती है...इन हालातों में भी धन्य हैं वे शिवभक्त जो बगैर किसी आत्मप्रदर्शन के बम भोले का उद्घोष करते विनम्रता के साथ अपने लक्ष्य की ओर शांति और श्रद्धा के साथ बढ़ते जाते हैं।

पुस्तक मेलाः सिनेमा और साहित्य

गाँव-देहात का एक बालक जे. के. रोलिंग की ‘हैरी पॉटर’ नहीं पढ़ सकता क्योंकि उसकी इतनी क्षमता  नहीं कि वह इसका हिंदी अनुवाद पढ़ने के लिए छह-सात सौ की मोटी रकम खर्च कर सके। उसके लिए सिनेमा ही वह माध्यम है जहाँ वह 20-30 रूपए खर्च कर वही आनंद उठा सकता है जो धनाढ्य वर्ग के किसी पब्लिक स्कूल में जाने वाले बच्चे को इस पुस्तक के मूल अंग्रेजी संस्करण को पढ़ने से मिलता है। मोटे तौर पर इस बात से समझा जा सकता है कि सिनेमा और साहित्य दोनों ही विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम हैं किंतु सिनेमा साहित्य से अधिक पहुँच रखता है। बेशक साहित्य सर्जनात्मकता, सामाजिक सरोकारों और प्रतिबद्धताओं के लिए जाना जाता है किंतु एक समय था जब हिंदी सिनेमा ने दो बीघा जमीन, मदर इंडिया, जागते रहो, प्यासा, कागज के फूल, आवारा जैसी फिल्में दी जो निश्चित रूप से किसी यथार्थवादी उपन्यास से कम नहीं आँकी जा सकती। ये वो फिल्में थी सोद्देश्य बनाई गईं थी और इनका काम हल्के-फुल्के मनोरंजन तक ही सीमित नहीं था। 70 के दशक में जब समांतर सिनेमा अस्तित्व में आया तो निशांत, मंडी, अंकुर, दामुल, गर्म हवा, बाजार जैसी फिल्में सामने आईं। इन फिल्म…

हिंदी में लिखने की समस्‍या

ब्‍लॉग पर हिंदी में सीधे सीधे लिखना एक समस्‍या ही रही है। हालांकि इस कुछ प्रयासों के बाद मुझे काफी हद तक इस समस्‍या को सुलझाने में मदद मिली। किंतु विशेष चिंह जैसे चंद्रबिंदु, प्रश्‍नवाचक या डैस और डो‍टस आदि बनाने में अभी भी समस्‍या का सामना करना पड् रहा है। लेकिन यकीनन ये समस्‍याए नौसिखिया होने के कारण ही होंगी क्‍योंकि कुछ ब्‍लाॅग पर बहुत शुदद्य वर्तनी दिखाई देती है। मुझे फोन्‍ट कनवर्टर से लिखने में सुविधा रही क्‍योंकि उससे एकदम सही लिखा जाता है और वर्तनी खराब हो जाने की समस्‍या नहीं आती। ये लाइनें भी परीक्षण के लिए ही लिखी जा रही हैं। यदि सही नहीं आई तो फिर कनवर्टर ही एक सहारा रहेगा क्‍योंकि वर्तनी की गड्बड्ी पसंद नहीं आएगी।