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हिंदी में लिखने की समस्‍या

ब्‍लॉग पर हिंदी में सीधे सीधे लिखना एक समस्‍या ही रही है। हालांकि इस कुछ प्रयासों के बाद मुझे काफी हद तक इस समस्‍या को सुलझाने में मदद मिली। किंतु विशेष चिंह जैसे चंद्रबिंदु, प्रश्‍नवाचक या डैस और डो‍टस आदि बनाने में अभी भी समस्‍या का सामना करना पड् रहा है। लेकिन यकीनन ये समस्‍याए नौसिखिया होने के कारण ही होंगी क्‍योंकि कुछ ब्‍लाॅग पर बहुत शुदद्य वर्तनी दिखाई देती है। मुझे फोन्‍ट कनवर्टर से लिखने में सुविधा रही क्‍योंकि उससे एकदम सही लिखा जाता है और वर्तनी खराब हो जाने की समस्‍या नहीं आती। ये लाइनें भी परीक्षण के लिए ही लिखी जा रही हैं। यदि सही नहीं आई तो फिर कनवर्टर ही एक सहारा रहेगा क्‍योंकि वर्तनी की गड्बड्ी पसंद नहीं आएगी।

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पुस्तक मेलाः सिनेमा और साहित्य

गाँव-देहात का एक बालक जे. के. रोलिंग की ‘हैरी पॉटर’ नहीं पढ़ सकता क्योंकि उसकी इतनी क्षमता  नहीं कि वह इसका हिंदी अनुवाद पढ़ने के लिए छह-सात सौ की मोटी रकम खर्च कर सके। उसके लिए सिनेमा ही वह माध्यम है जहाँ वह 20-30 रूपए खर्च कर वही आनंद उठा सकता है जो धनाढ्य वर्ग के किसी पब्लिक स्कूल में जाने वाले बच्चे को इस पुस्तक के मूल अंग्रेजी संस्करण को पढ़ने से मिलता है। मोटे तौर पर इस बात से समझा जा सकता है कि सिनेमा और साहित्य दोनों ही विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम हैं किंतु सिनेमा साहित्य से अधिक पहुँच रखता है। बेशक साहित्य सर्जनात्मकता, सामाजिक सरोकारों और प्रतिबद्धताओं के लिए जाना जाता है किंतु एक समय था जब हिंदी सिनेमा ने दो बीघा जमीन, मदर इंडिया, जागते रहो, प्यासा, कागज के फूल, आवारा जैसी फिल्में दी जो निश्चित रूप से किसी यथार्थवादी उपन्यास से कम नहीं आँकी जा सकती। ये वो फिल्में थी सोद्देश्य बनाई गईं थी और इनका काम हल्के-फुल्के मनोरंजन तक ही सीमित नहीं था। 70 के दशक में जब समांतर सिनेमा अस्तित्व में आया तो निशांत, मंडी, अंकुर, दामुल, गर्म हवा, बाजार जैसी फिल्में सामने आईं। इन फिल्म…

उदास शाम

नित नया शून्य जो दिन-प्रतिदिन बड़ा होता जाता है। अपने चारों ओर खड़ी दीवारें जो धीरे-धीरे ऊँची होती जा रही हैं। इतनी ऊँची कि अब कुछ दिनांे बाद  लगता है कि आशा की कोई किरण भी उस तक मुश्किल पहुँच पाएगी। हर  रात के बाद एक सवेरा होता है किंतु काल-कोठरी के कैदी के लिए कोई सवेरा नहीं होता। उसके लिए होती है बस एक स्याह रात....... दिन रात!

भागना और भागते जाना , शायद यही नियति बन चुकी है। किससे भाग रहा हूँ? अपने वर्तमान से या उज्जवल भविष्य का पीछा करने के लिए ये अनवरत दौड़ जारी है। हर दिन शुरू होता है और उदास शाम के साथ समाप्त हो जाता है। शरीर और मन दोनों ही थक जाते हैं और लगता है वर्षांे की निष्फल अवधि में एक दिन और आज फिर जुड़ गया।

ये खीज..... ये निराशा.... ये हताशा...... ये असफलता ....... एक गहरे काले निराशा के मलबे में बदल जाती है और मन के सुप्त ज्वालामुखी की तली में जमती चली जाती है। फिर यकायक एक दिन वो ज्वालामुखी फूट पड़ता है, कहीं भी, कभी भी, किसी ओर भी। सालों का जमा वो मैल बाहर निकलने को दौड़ पड़ता है और हर तरफ लावा ही लावा। जो शायद जला देना चाहता है अपने आस-पास की हर रचना को। चूस लेना…
ये जीत आम आदमी की...
राजनीति में आम आदमी का अस्तित्व और भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए यह जीत बहुत थी। भाजपा केवल और केवल जीतने के लिए चुनाव लड़ रही थी लेकिन आप पार्टी के लिए यह जिंदा रहने का संघर्ष था। भाजपा ने  इस चुनाव को अपनी नाक का प्रश्न बना लिया था लेकिन आप पार्टी की ध्यान केवल अपने लक्ष्य की ओर लगा था। यदि इस चुनाव में वह हार जाती तो शायद पूरी तरह बिखर जाती। बचती भी तो उसे फिर से खडा करने में कितना समय लगता, बता पाना मुश्किल है।
बिना किसी कोलाहल और शोर-शराबे के आप के वालंटियर अपना काम कर रहे थे। ये वालंटियर ही किसी पार्टी की रीढ़ की हड्डी होते हैं। कांग्रेस का सेवादल कभी ऐसे ही काम करता था, भाजपा के लिए संघ के स्वयंसेवक भी यही काम करते थे। सालों से पार्टी के लिए काम कर रहे भाजपा के कार्यकर्ताओं की घोर अनदेखी हुई और रातों-रात दूसरी पार्टियों के बगावती लोगों को शीर्ष पर बैठाने और टिकट बाॅंटने से भाजपा के कार्यकर्ता मायूसी और हताशा घिर गए और उन्होंने काम करने से पल्ला झाड़ लिया। नतीजतन भाजपा के नीचे से जमीन कब खिसक गई, उसे पता ही नहीं चला। इस चुनाव में भाजपा के प्रचार का स्तर अत्यंत …